अभ्युत्थानं धर्मस्य

 
             
                             
श्रीमद्भगवद गीता में श्रीकृष्ण के दिए हुए उपदेश के श्लोकों में 'अभ्युत्थानं धर्मस्य' का जिक्र हुआ है ।

युद्ध के मैदान में अपने सगे-सम्बन्धियों को देख कर अर्जुन जैसा महान धनुर्धारी भी विचलित हो उठता है ।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा की वो अहिंसा का पुजारी है, वो किसी प्रकार की हिंसा नहीं चाहता ।

सोचने वाली बात यह थी की- अर्जुन तो जन्मजात क्षत्रिय है , युद्ध उसके रक्त में है । आजतक अर्जुन ने जितने भी युद्ध किये सब में उसने विजय प्राप्त की है।
पर आज अचानक रणभूमि में अर्जुन अहिंसा का पुजारी कैसे बन गया ????

श्रीकृष्ण सब समझ चुके थे की ये उसका मोह है जो धर्म के आड़े आ रहा है।
मोह से बाहर लाने के लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिए ।

"हमारा आज का जीवन भी अति मोह और माया से भरा हुआ है। हम मोह माया में फँस कर अक्सर विपरीत कार्य कर बैठते हैं ।
अर्जुन तो फिर भी रिश्तों के मोह में फँस गये थे, लेकिन अब लोग स्वार्थ में या धन के लोभ में रिश्ते नाते सब दांव में लगा देते है।

*अज्ञानता अहंकार की जननी है *

जरूरी नहीं की जो पढ़ा लिखा हो वह ज्ञानी हो या जो अनपढ़ हो वह अज्ञानी ।
हमें अब के जीवन में 'धर्मनिर्पेक्ष' होने के लिए शिक्षा के साथ साथ सामाजिक जनदृष्टि और स्वयं की समझ होना आवश्यक है ।

अर्जुन के पास तो फिर भी श्रीकृष्ण थे लेकिन हमारे पास सही और गलत के चुनाव हेतु हम खुद होते है।
एक समय के बाद माँ-बाप भी हमारे पास सही गलत बताने के लिए नहीं होते। वहाँ हमें। विवेक का इस्तेमाल करना पड़ता है।

धर्म कोई जाति विशेष या वर्ण से जुड़ा हुआ नहीं है। धर्म स्वयं की अंतरात्मा और परमात्मा के मिलान का एकमात्र माध्यम है।"


         *अभ्युत्थानं धर्मस्य *



🖋️अंकित त्रिपाठी 🖋️

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