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अभ्युत्थानं धर्मस्य

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                                              श्रीमद्भगवद गीता में श्रीकृष्ण के दिए हुए उपदेश के श्लोकों में 'अभ्युत्थानं धर्मस्य' का जिक्र हुआ है । युद्ध के मैदान में अपने सगे-सम्बन्धियों को देख कर अर्जुन जैसा महान धनुर्धारी भी विचलित हो उठता है । अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा की वो अहिंसा का पुजारी है, वो किसी प्रकार की हिंसा नहीं चाहता । सोचने वाली बात यह थी की- अर्जुन तो जन्मजात क्षत्रिय है , युद्ध उसके रक्त में है । आजतक अर्जुन ने जितने भी युद्ध किये सब में उसने विजय प्राप्त की है। पर आज अचानक रणभूमि में अर्जुन अहिंसा का पुजारी कैसे बन गया ???? श्रीकृष्ण सब समझ चुके थे की ये उसका मोह है जो धर्म के आड़े आ रहा है। मोह से बाहर लाने के लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिए । "हमारा आज का जीवन भी अति मोह और माया से भरा हुआ है। हम मोह माया में फँस कर अक्सर विपरीत कार्य कर बैठते हैं । अर्जुन तो फिर भी रिश्तों के मोह में फँस गये थे, लेकिन अब लोग स्वार्थ में या धन के...